मुनि श्री 108 सौम्य सागर जी का मंगल प्रवचन : "राग, अनुराग और विराग – जीवन के तीन रंग, इनका संतुलन ही समाधान"
उन्होंने जीवन की तुलना आधुनिक कृषि से करते हुए कहा कि आज के समय में हाइब्रिड बीजों की तरह हमारे विचार भी बाज़ारवाद, लालच और चालाकी से संक्रमित हो गए हैं।---
जब बीज ही लोभ और व्यापार से बोए जाएँगे, तो जीवन की फसल में रोग आना अवश्यंभावी है, इसलिए हमें अपने धर्म के बीज को शुद्ध और सुरक्षित रखना चाहिए।”
आगरा । श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर, छिपीटोला में आयोजित भव्य धर्मसभा में मुनि श्री 108 सौम्य सागर जी महाराज के प्रेरणास्पद एवं चिंतनशील प्रवचन ने श्रोताओं के हृदय को गहराई से स्पर्श किया। मुनि श्री सौम्य सागर जी का प्रवचन मंगल केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक पक्षों के बीच संतुलन बनाने की प्रेरणा है। उन्होंने अपने वक्तव्य के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि यदि जीवन में स्थायी शांति और संतोष चाहिए, तो विचारों, कर्मों और इच्छाओं में सामंजस्य आवश्यक है।मुनिश्री की वाणी ने न केवल धार्मिक चेतना को जागृत किया, बल्कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं और भौतिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच संतुलन साधने की आवश्यकता पर भी स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया।सन्देश : राग, अनुराग और विराग – जीवन के तीन रंग, इनका संतुलन ही समाधान है।मुनिश्री ने प्रवचन के दौरान गूढ़ विषयों को सहज और सारगर्भित शैली में प्रस्तुत करते हुए कहा कि “अनुराग, राग और विराग — ये तीनों शब्द एक ही मूल से उपजते हैं, परन्तु प्रत्येक का अर्थ और प्रभाव भिन्न है। राग तो सामान्य है, परंतु अनुराग के लिए विशेष प्रयास और विराग के लिए तो आत्मचिंतन व त्याग आवश्यक है। राग के साथ दोष की छाया अनिवार्य है, जैसे किसी बीज के साथ खरपतवार स्वाभाविक रूप से आती है।”उन्होंने जीवन की तुलना आधुनिक कृषि से करते हुए कहा कि आज के समय में हाइब्रिड बीजों की तरह हमारे विचार भी बाज़ारवाद, लालच और चालाकी से संक्रमित हो गए हैं। “जब बीज ही लोभ और व्यापार से बोए जाएँगे, तो जीवन की फसल में रोग आना अवश्यंभावी है। इसलिए हमें अपने धर्म के बीज को शुद्ध और सुरक्षित रखना चाहिए।”प्रवचन में आध्यात्मिकता और व्यावहारिकता का समन्वय मुनि श्री के विचारों में गहरी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि के साथ ही व्यवहारिक जीवन की सटीक व्याख्या दिखाई दी। उन्होंने कहा कि जीवन केवल तप या त्याग से नहीं, बल्कि संतुलन से परिपूर्ण होता है। “धार्मिकता का तात्पर्य केवल बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और विवेकपूर्ण आचरण है।”श्रद्धालुओं में जागरूकता की लहर,प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। मुनिश्री के पाद प्रचालन श्रद्धालुओं ने किया तथा आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी की पूजा अर्चना की सभागार में उपस्थित प्रत्येक श्रावक मुनिश्री की वाणी में आत्मिक ऊर्जा और जीवन-दर्शन का अद्भुत समन्वय अनुभव कर रहा था। प्रवचन के उपरांत श्रद्धालुओं ने मुनि श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया और उनके विचारों को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
Jarnlista, Satish Mishra Agra



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