मुनिश्री निश्चय सागर जी महाराज का 13वां दीक्षा महोत्सव निर्मल सदन में भव्यता और आध्यात्मिक गरिमा के साथ संपन्न


 मुनि श्री 108 सौम्य सागर जी का ओजस्वी प्रवचन: "जीवन में संतुलन, आत्मचिंतन और सेवा भाव ही है सच्चा धर्म""अनावश्यक न बोलें सामने बाला आपके वचनों की क़ीमत करता रहें बस उतना ही बोलना""कभी किसी से इतने नाराज़ तो होना कि सामने बाला आप की क़ीमत पहचानने लग जाएं लेक़िन इतना नाराज़ मत हो जाना की वो तुम्हारे विना जीना ही सीखा जाएं"

सबसे महत्वपूर्ण बात  ‘छोटा परिवार, दुखी परिवार’ परिवार तभी सुखी होता है जब उसमें वृद्धजन हों, और उनकी सेवा की भावना हो, अपने माता-पिता की बीमारी में सेवा करना केवल एक कर्तव्य नहीं, वह सबसे बड़ा धर्म है।"

आगरा। मुनिश्री निश्चय सागर जी महाराज के 13वें दीक्षा महोत्सव का आयोजन रकाबगंज थाने के पीछे निर्मल सदन में भव्यता और आध्यात्मिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। समारोह का शुभारंभ मंगलाचरण से हुआ, जिसके पश्चात आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की भक्तिपूर्वक पूजा अर्चना की गई। इसके बाद मुनिश्री सौम्यासागर जी द्वारा मुनिश्री निश्चय सागर जी के पाद प्रक्षालन कर गुरुपरंपरा के प्रति श्रद्धा अर्पित की गई।इस अवसर पर अपने मंगल उद्बोधन में मुनिश्री निश्चय सागर जी महाराज ने अपने दीक्षा के पावन क्षणों को स्मरण करते हुए बताया कि उनकी दीक्षा आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सान्निध्य में रामटेक, महाराष्ट्र में संपन्न हुई थी। उन्होंने अपने जीवन की शुरुआती यात्रा को साझा करते हुए बताया कि उनका जन्म अशोकनगर में हुआ था। जीवन के विविध अनुभवों के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को संयम, सेवा और मौन के महत्व का संदेश दिया।

मौलिक विचारों से स्पर्श किया जनमानस

मुनिश्री ने कहा, "पहली महत्वपूर्ण बात अनावश्यक न बोलें। सामने वाला आपके वचनों की क़ीमत करता रहे, इतना ही बोलना पर्याप्त है। शब्दों का मूल्य तभी बना रहता है जब उनका प्रयोग मितव्ययिता से किया जाए।"दूसरे बिंदु पर उन्होंने गहरी संवेदनशीलता के साथ कहा, "कभी किसी से इतने नाराज़ तो हो जाइए कि वह आपकी क़ीमत समझने लगे, लेकिन इतना नहीं कि वह आपके बिना जीना सीख जाए। नाराज़गी में भी मर्यादा आवश्यक है, ताकि संबंध जीवित रहें।"तृतीय और सबसे महत्वपूर्ण विचार के रूप में उन्होंने कहा, "‘छोटा परिवार, दुखी परिवार’ यह कथन आज के संदर्भ में बहुत अर्थपूर्ण है। परिवार तभी सुखी होता है जब उसमें वृद्धजन हों, और उनके प्रति सेवा की भावना हो। माता-पिता की बीमारी में सेवा करना केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि वह सबसे बड़ा धर्म है।"

आधुनिक जीवनशैली पर भी किया विचार-विमर्श

मुनिश्री ने अपने वक्तव्य में आधुनिक जीवन की आपाधापी पर भी चिंतन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा, "आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली में परिवार, सेवा और संबंधों के बीच संतुलन साधना ही सच्चा धर्म है। बुज़ुर्गों की उपेक्षा समाज की जड़ों को खोखला कर देती है। युवा पीढ़ी को आत्मनिरीक्षण कर जीवन के मूल्यों को पुनः अपनाने की आवश्यकता है।"मुनिश्री सौम्यासागर जी ने भी अपने संबोधन में कहा, "जीवन में संतुलन और सेवा भाव ही सच्चे धर्म के मूल हैं। जब तक परिवार और समाज में आपसी सेवा और संवेदना जीवित हैं, तब तक मानवता सुरक्षित है।"

श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा सभागार

इस पावन अवसर पर जैन भवन श्रद्धालुओं की उपस्थिति से खचाखच भरा रहा। समूचा सभागार आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति से अनुप्राणित रहा। मुनिश्री की ओजस्वी वाणी ने जनसमुदाय के अंतर्मन को छुआ और उन्हें गहन आत्मचिंतन की दिशा में प्रेरित किया।

उपस्थित विशिष्टजन

समारोह में अध्यक्ष मुकेश कुमार जैन ‘बल्लू’, महामंत्री मुरारीलाल जैन, अनिल फौजी, प्रवेश कुमार जैन, अक्षय जैन, हीरालाल बेनाडा, पन्नालाल बेनाडा, अशोक जैन, सत्येंद्र जैन, दयाचंद जैन, रमेशचंद जैन, विमल जैन, राजीव जैन, दीपक जैन, मोहित जैन तथा मीडिया प्रभारी दिलीप जैन सहित अनेक श्रद्धालु एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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