आज के भौतिकतावादी युग में जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों के बीच संतुलन अत्यंत आवश्यक"


 आगरा, छिपीटोला जैन भवन। श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर, छिपीटोला में आयोजित धर्मसभा के अवसर पर मुनि श्री 108 सौम्य सागर जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में जीवन के गूढ़ रहस्यों को उजागर करते हुए श्रोताओं के अंतर्मन को गहराई से स्पर्श किया। यह विचारोत्तेजक और ज्ञानवर्धक प्रवचन न केवल आध्यात्मिक जागरूकता का स्रोत बना, बल्कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं और मानसिक द्वंद्व को समझने की दिशा भी प्रदान करता है।मुनि श्री ने अपने प्रवचन में कहा, "द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव—ये चार मूल तत्व हैं जो हमारे कर्मों के फल निर्धारण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जब ये चारों तत्व अनुकूल निमित्त बनते हैं, तभी कर्म अपना फल देने को तत्पर होते हैं, जिसे हम 'कर्मों का उदय' कहते हैं।" इस गूढ़ दर्शन को मुनिश्री ने अत्यंत सरल, प्रभावशाली और जीवनोपयोगी उदाहरणों के माध्यम से समझाया, जिससे श्रोताओं को न केवल समझ आई, बल्कि आत्ममंथन की प्रेरणा भी मिली।मुनिश्री ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि आज के भौतिकतावादी युग में जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों के बीच संतुलन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संतुलन से ही जीवन में स्थायित्व, शांति और आत्मिक उन्नति संभव है।धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति मुनि श्री की लोकप्रियता और उनके प्रवचनों की आध्यात्मिक गहराई का प्रमाण थी। श्रोताओं ने मुनिश्री की वाणी में संयम, विवेक, व्यवहारिकता और दर्शन का अद्भुत संगम अनुभव किया। हर शब्द में आत्मिक ऊर्जा का संचार था, जो जीवन की दिशा बदलने में समर्थ प्रतीत हुआ।प्रवचन के उपरांत श्रद्धालुओं ने मुनि श्री से आशीर्वाद प्राप्त किया और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन आत्मिक उत्साह, श्रद्धा और नवजागरण की भावना के साथ हुआ।मुनि श्री 108 सौम्य सागर जी महाराज का यह मंगल प्रवचन न केवल एक धार्मिक आयोजन था, बल्कि जीवन के यथार्थ और आध्यात्मिक ऊँचाइयों को समझने का एक सशक्त माध्यम भी सिद्ध हुआ। उनका संदेश आज के समाज के लिए एक अमूल्य मार्गदर्शन है।


Jarnlista, satish Mishra, Agra 

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