सफर-ए-शहादत’ शहीदी सप्ताह के पांचवे दिन में माता गुजरी जी एवं छोटे साहिबजादों के अद्वितीय त्याग, धैर्य और शहादत की मार्मिक गाथा
आगरा,श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के साहिबजादों की महान शहादत को नमन करते हुए गुरुद्वारा दशमेश दरबार, शहीद नगर/विभव नगर, आगरा में आयोजित शहीदी गुरमत समागम ‘सफर-ए-शहादत’ शहीदी सप्ताह के पांचवे दिन का दीवान श्रद्धा, त्याग और गहन भावनात्मक वातावरण में सम्पन्न हुआ, सम्पूर्ण दीवान गुरु साहिब के परिवार द्वारा धर्म और मानवता की रक्षा हेतु दिए गए अतुलनीय बलिदान को समर्पित रहा।आज के दीवान में पंथ के प्रसिद्ध कथा विचारक भाई साहिब भाई बलदेव सिंह (मोहाली वाले) ने गुरमत विचारों के माध्यम से संगत को उस हृदयविदारक इतिहास से अवगत कराया, जब चमकौर की जंग के पश्चात गुरु परिवार सरसा के कंडे बिछोड़े के बाद माता गुजरी और छोटे साहिबजादें बाबा जोरावर सिंह जी एवं बाबा फतेह सिंह जी—को साथ लेकर अत्यंत कठिन यात्रा पर सबर से निकले।कथा के दौरान भाई साहिब ने भावपूर्ण वर्णन किया कि किस प्रकार माता गुजरी जी ने अपार कष्टों, भय और ठंड के बीच गांव-गांव भटकते हुए बच्चों की रक्षा की, अद्भुत धैर्य और विश्वास के साथ आगे बढ़ती रहीं, सबसे पहले वे कुम्बे मास्की की झुग्गी में एक रात ठहरीं, जहाँ उनका सामना गंगू पापी से हुआ,जिसने पहले सेवा का दिखावा किया, परंतु बाद में लालच और विश्वासघात के कारण माता जी और साहिबजादों को मुगल अधिकारियों के हवाले कर दिया।इसके पश्चात माता गुजरी जी और दोनों छोटे साहिबजादों को सरहिंद ले जाया गया, जहाँ उन्हें ठंडी बुर्ज में कैद कर अमानवीय यातनाएँ दी गईं, भाई साहिब ने बताया कि भीषण ठंड, भूख और भय के वातावरण में भी माता गुजरी जी ने बच्चों के मन में तनिक भी विचलन नहीं आने दिया, बल्कि उन्हें गुरसिखी, धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देती रहीं।कथा का सबसे मार्मिक प्रसंग उस समय आया जब जानी ख़ान और मानी ख़ान के माध्यम से साहिबजादों को कचहरी में प्रस्तुत किया गया, बाल अवस्था में होते हुए भी साहिबजादों ने इस्लाम स्वीकार करने के प्रलोभन को ठुकरा दिया और स्पष्ट शब्दों में धर्म से विमुख होने से इनकार कर दिया, परिणामस्वरूप उन्हें दीवार में जीवित चिनवाने का अमानवीय दंड जिक्र किया गया, यह दृश्य सुनकर सम्पूर्ण संगत अश्रुपूरित नेत्रों से नतमस्तक हो उठी।कथावाचन के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि माता गुजरी जी का त्याग और छोटे साहिबजादों की अडिग आस्था सिख इतिहास ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए अदम्य साहस, विश्वास और धर्मनिष्ठा का शाश्वत उदाहरण है, कथा श्रवण के दौरान दीवान स्थल पर शोक, श्रद्धा और गर्व से ओत-प्रोत वातावरण बन गया।वीर हरजिंदर सिंह द्वारा गुरबाणी कीर्तन सुन संगत भाव विभोर हुई, गुरु की अरदास हुकुमनामा के अपरान्त सभी धर्म प्रेमियों ने गुरु का अटूट लंगर पाकर गुरु महाराज जी का शुकराना किया।संगतमे हरचरन सिंह, वीर मीत चंडोक, हर्षिल भोजवानी,संजय सेठ, इकबाल सिंह, जसविंदर सिंह,हरजीत सिंह भसीन, हरजिंदर सिंह, जसवीर सिंह, रिंकू वीर, बॉबी सलूजा, रविंद्र सिंह वडेरा, माधव उपाध्याय, ज्ञानी मंशा सिंह, ग्रंथी मनदीप सिंह, कृपाल सिंह, सनी सिंह, धर्मेंद्र सिंह, देव कुमार, प्रमोद अरोड़ा आदि




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