युवा मानसिक स्वास्थ्य पर विशेषज्ञों ने किया मंथन, भावनात्मक शिक्षा को बताया समय की आवश्यकता
प्रिल्यूड पब्लिक स्कूल, ई-क्यूब लैब (E-Cube Lab) एवं फीलिंग माइंड्स द्वारा युवा मानसिक स्वास्थ्य एवं भावनात्मक शिक्षा को समर्पित एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों से आए मनोविज्ञान एवं मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने युवाओं के सामने उभरती मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों तथा उनके लिए प्रभावी सहयोग तंत्र विकसित करने पर विस्तृत चर्चा की।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. नवीन कुमार (प्रोफेसर, मनोविज्ञान विभाग, डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय) रहे।कार्यक्रम में प्रो. आराधना शुक्ला (सेवानिवृत्त प्रोफेसर, मनोविज्ञान, कुमाऊं विश्वविद्यालय, एसएसजे कैंपस, अल्मोड़ा), डॉ. कल्पना श्रीवास्तव (निदेशक, एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बिहेवियरल हेल्थ एंड अलाइड साइंसेज) तथा डॉ. दुर्गेश कुमार उपाध्याय (असिस्टेंट प्रोफेसर, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी) ने अपने विचार साझा किए।दोनों पैनल चर्चाओं में डॉ. दीप्तिमाला अग्रवाल, डॉ. रेणु अग्रवाल एवं डॉ. तृप्ति सखूजा ने पैनलिस्ट के रूप में सहभागिता करते हुए युवा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने अनुभव एवं विशेषज्ञ दृष्टिकोण साझा किए। इस अवसर पर ISMHAA (Indian Society of Mental Health Awareness & Advancement) के उपाध्यक्ष डॉ. सुशील गुप्ता एवं अध्यक्ष डॉ. चीनू अग्रवाल* ने भी युवा मानसिक स्वास्थ्य एवं भावनात्मक शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।कार्यक्रम में Sharachi के संस्थापक एवं E-Cube Lab के Creator श्री शैलेश कुमार जिंदल ने भावनात्मक शिक्षा को अनुभवात्मक एवं व्यावहारिक बनाने की अवधारणा और ई-क्यूब लैब की भूमिका पर प्रकाश डाला।कार्यक्रम के दौरान “युवा मानसिक स्वास्थ्य—उभरती चिंताएं एवं चुनौतियां” तथा “युवा मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहयोग तंत्र का निर्माण” विषयों पर दो महत्वपूर्ण पैनल चर्चाएं आयोजित की गईं।विशेषज्ञों ने* कहा कि आज के युवा शैक्षणिक एवं करियर संबंधी दबाव, सामाजिक अपेक्षाओं, डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव, संबंधों से जुड़ी चुनौतियों, पहचान संबंधी प्रश्नों तथा भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मानसिक स्वास्थ्य को केवल बीमारी के उपचार तक सीमित न रखते हुए भावनात्मक शिक्षा, आत्म-जागरूकता, लचीलापन और मजबूत सामाजिक एवं पारिवारिक सहयोग पर ध्यान देना आवश्यक है।वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि युवाओं को केवल सलाह देने के बजाय उन्हें सुना जाए, समझा जाए और बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी बात रखने के लिए सुरक्षित वातावरण दिया जाए। परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय, शिक्षक, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और समुदाय—सभी को मिलकर एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम विकसित करना होगा। कार्यक्रम में भारत की पहली ई-क्यूब लैब (Experiential Emotional Education Lab) का भी अवलोकन कराया गया। ई-क्यूब लैब का उद्देश्य भावनात्मक शिक्षा को केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित न रखकर उसे अनुभवात्मक, संवादात्मक एवं व्यावहारिक बनाना है, ताकि बच्चे और युवा अपनी भावनाओं को समझने, व्यक्त करने तथा प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के कौशल विकसित कर सकें।कार्यक्रम के अगले चरण में शिक्षक दिवस समारोह आयोजित किया गया, जिसमें शिक्षा एवं युवा कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले प्रधानाचार्यों एवं विद्यालय प्रमुखों का सम्मान किया गया।आयोजकों ने* कहा कि युवा मानसिक स्वास्थ्य आज केवल एक चिकित्सकीय विषय नहीं, बल्कि शिक्षा और समाज की साझा जिम्मेदारी है। भावनात्मक रूप से सक्षम बच्चों और युवाओं का निर्माण करने के लिए शिक्षा में भावनात्मक अधिगम और जीवन कौशल को उचित स्थान देना होगा।कार्यक्रम का समापन प्रेस वार्ता के साथ हुआ, जिसमें विशेषज्ञों एवं आयोजकों ने युवा मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक शिक्षा को विद्यालयी एवं सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
Satish Mishra Agra

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